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Ek Aur Akaal | Kedarnath Singh
Ek Aur Akaal | Kedarnath Singh

Ek Aur Akaal | Kedarnath Singh

00:02:27
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एक और अकाल |  केदारनाथ सिंहसभाकक्ष मेंजगह नहीं थीतो मैंने कहा कोई बात नहींसड़क तो हैचल तो सकता हूँसो, मैंने चलना शुरू कियाचलते-चलते एक दिनअचानक मैंने पायामेरे पैरों के नीचेअब नहीं है सड़कतो मैंने कहा चलो ठीक हैन सही सड़कमेरे शहर में एक गाती-गुनगुनाती हुईनदी तो हैफिर एक दिनबहुत दिनों बादमैंने सुबह-सुबह जब खिड़की खोलीतो देखा-तट उसी तरह पड़े हैंऔर नदी ग़ायब!यह मेरे लिएअनभ्र बज्रपात थापर मैंने ख़ुद को समझायायार, दुखी क्यों होते होइतने कट गएबाक़ी भी कट ही जाएँगे दिनक्योंकि शहर में लोग तो हैं।फिर एक दिनजब किसी तरह नहीं कटा दिनतो मैं निकल पड़ालोगों की तलाश मेंमैं एक-एक से मिलामैंने एक-एक से बात कीमुझे आश्चर्य हुआलोगों को तो लोगजानते तक नहीं थे!

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