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Suno Sitaron! | Nasira Sharma
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Suno Sitaron! | Nasira Sharma

00:02:52
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सुनो सितारों! | नासिरा शर्मा कहाँ गुम हो जाते हो तुम रात आते हीजाते हो शराबख़ाने या फिरथके हारे मज़दूर की तरहपड़ जाते हो बेसुध चादर ओढ़ तुम!मच्छर लाख काटें और गुनगुनाएँउठते नहीं हो तुम नींद सेकुछ तो बताओ आख़िर कहाँ चले जाते हो तुमहमारी आँखों की पहुँच से दूरअंधेरी रातों में आ जाते थे रौशनी भरनेआँखों में आँखें डाल टिमटिमाते थेसारे दिन की थकी आँखों को सेकते थे औरबिना बोले ही बहुत कुछ बतियाते थेमौसम कोई भी हो, तुम चमकना नहीं भूलतेचाँद निकले या न निकले,सूरज के डूबते हीतुम मिलने चले आते थेनींद में डूबती आँखों में तुम ऐसा भ्रम भरतेजैसे ओढ़ रखी हो सितारों टँकी चादर हमनेतुम्हारी यादों को आज भी सजा रखा हैअपने छोटे से फ़्लैट के कमरे की छत परयह सोच कर कि कैसे बन जाते थे रिश्ते तबजब हमें क़ुदरत लिए फिरती थीं अपनी बाँहों मेंछूट गया तारों की छाँव का वह आँगन हमसेजो न उभरेगा कभी मेरे बच्चों की निगाहों मेंसमझ न पायेंगे ज़मीन से आसमान के रिश्तों कोवह जायेंगे देखने तुम्हें तारा-मंडल में।

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