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Beej Pakhi | Hemant Deolekar
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Beej Pakhi | Hemant Deolekar

00:02:08
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बीज पाखी | हेमंत देवलेकर यह कितना रोमांचक दृश्य है:किसी एकवचन को बहुवचन में देखनापेड़ पैराशुट पहनकर उत्तर रहा है।वह सिर्फ़ उतर नहीं रहाबिखर भी रहा है।कितनी गहरी व्यंजना : पेड़ को हवा बनते देखने मेंसफ़ेद रोओं के ये गुच्छेमिट्टी के बुलबुले हैपत्थर हों या पेड़ मन सबके उड़ते हैंहर पेड़ कहीं दूरफिर अपना पेड़ बसाना चाहता हैऔर यह सिर्फ़ पेड़ की आकांक्षा नहींआब-ओ-दाने की तलाश में भटकता हर कोईउड़ता हुआ बीज है।

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