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Tumse Alag Hokar | Sarveshwar Dayal Saxena
Tumse Alag Hokar | Sarveshwar Dayal Saxena

Tumse Alag Hokar | Sarveshwar Dayal Saxena

00:02:49
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तुमसे अलग होकर। सर्वेश्वरदयाल सक्सेनातुमसे अलग होकर लगता हैअचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं,और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर मेंगिरता जा रहा हूँ।अब कहीं कोई यात्रा नहीं है,न अर्थमय, न अर्थहीन;गिरने और उठने के बीच कोई अंतर नहीं।तुमसे अलग होकरहर चीज़ में कुछ खोजने का बोधहर चीज़ में कुछ पाने कीअभिलाषा जाती रहीसारा अस्तित्व रेल की पटरी-सा बिछा हैहर क्षण धड़धड़ाता हुआ निकल जाता है।तुमसे अलग होकरघास की पत्तियाँ तक इतनी बड़ी लगती हैंकि मेरा सिर उनकी जड़ों सेटकरा जाता है,नदियाँ सूत की डोरियाँ हैंपैर उलझ जाते हैं,आकाश उलट गया हैचाँद-तारे नहीं दिखाई देते,मैं धरती पर नहीं, कहीं उसके भीतरउसका सारा बोझ सिर पर लिए रेंगता हूँ।तुमसे अलग होकर लगता हैसिवा आकारों के कहीं कुछ नहीं है,हर चीज़ टकराती हैऔर बिना चोट किए चली जाती है।तुमसे अलग होकर लगता हैमैं इतनी तेज़ी से घूम रहा हूँकि हर चीज़ का आकारऔर रंग खो गया है,हर चीज़ के लिएमैं भी अपना आकार और रंग खो चुका हूँ,धब्बों के एक दायरे मेंएक धब्बे-सा हूँ,निरंतर हूँऔर रहूँगाप्रतीक्षा के लिएमृत्यु भी नहीं है।

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