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Bitiya Murmu Ke Liye | Nirmala Putul
Bitiya Murmu Ke Liye | Nirmala Putul

Bitiya Murmu Ke Liye | Nirmala Putul

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बिटिया मुर्मू के लिए |  निर्मला पुतुलउठो कि अपने अँधेरे के ख़िलाफ़ उठोउठो अपने पीछे चल रही साज़िश के ख़िलाफ़उठो, कि तुम जहाँ हो वहाँ से उठोजैसे तूफ़ान से बवण्डर उठता हैउठती है जैसी राख में दबी चिनगारीदेखो ! अपनी बस्ती के सीमान्त परजहाँ धराशाई हो रहे हैं पेड़कुल्हाड़ियों के सामने असहायरोज़ नंगी होती बस्तियाँएक रोज़ माँगेगी तुमसेतुम्हारी ख़ामोशी का जवाबसोचो-तुम्हारे पसीने से पुष्ट हुए दाने एक दिन लौटते हैंतुम्हारा मुँह चिढ़ाते तुम्हारी ही बस्ती की दुकानों परकैसा लगता है तुम्हें जबतुम्हारी ही चीज़ेंतुम्हारी पहुँच से दूर होती दिखती हैं ?

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