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Dhat | Krishna Mohan Jha
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00:02:15
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धत । कृष्णमोहन झाचाय-बिस्कुट-नमकीनधतचुटकुलों और निन्दाओं और नक़ली ठहाकोधतहोड़ लेती विनम्रताओं और खोखली सुंदरताओंधतराजनीतिक रूप से सही कविताओं और पुरस्कार के लिए लार टपकाती जिह्वाओंधतबर्थडे-मैरेजडे-मदर्सडे-फ़ादर्सडे-चिल्ड्रेंसडे- टीचर्सडे-हेल्थडे-ड्रायडे आदिधत महँगाई-भत्ता और इन्क्रीमेंटधत जीवनबीमा और मेडिकल इंश्योरेंसधत होमलोन-आरडी-जीपीएफ-पीपीएफधत शर्मा-वर्मा-कुमार- गुप्ता-मिश्रा चौहान- राव-रंजन-झा इत्यादिधतरेंगने-रिरियाने की भाषाधत एक कील में कब से ठुकी हुईमनुष्य होने की अन्तिम परिभाषाइन भाषाओं और परिभाषाओं को तोड़-फोड़करअपने सारे कपड़े-लत्ते छोड़करनिष्कवच और निर्वस्त्रमैं निकल जाना चाहता हूँ एक ऐसी अन्तहीन यात्रा परअपनी त्वचा तक उतार सकना शामिल हो जिसमेंफिर मैं देखता हूँवह कौन है जो आता है मेरे साथऔर कौन रक्त से छलछलाते मेरे शरीर पर फेंकता है पत्थर

Dhat | Krishna Mohan Jha

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