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Shraadh | Ashutosh Sharma
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श्राद्ध - आशुतोष शर्मा किसी चींटी को बचपन में कुचला थाकेंचुए को बीच से काट दिया था मेरा जूताछत से मारे थे चप्पल किसी भिखारी कोकिसी को कुलटा तो किसी को कहा वेश्याझूलों पे बन बैठा कभी तानाशाहउपेक्षकों की सामूहिकता में रहा कभी शामिलबहनों के बस्तों में भर दी छिपकलियांमारे थे कंकड़ कभी मां के एड़ी परपत्थर से उजाड़ दिया किसी बुलबुल का आशियानाअग्नि नहीं जला सकता मेरा अधर्मगंगाजल को सोख जाएगा मेरा कोढ़पीले पड़ जायेंगे मेरे मुख में वृन्दापर्णसंस्कारच्युत शवों की भांति भटक रहा है मेरा पापमृत्यु पर सिरहाने मेरेपंजे जूते चप्पलककड़ पत्थर और छिपकलियां थीकिन्तु मेरे श्राद्ध में नदारद थेचींटी बुलबुल केंचुए भिखारी बस्ते उपेक्षित और झूलेकुलटाएं वेश्याएं बहनें व माताएंकिसी शास्त्रीय वर्जना के कारणजीते जी नहीं आ सकते शमशानउनके मृत्यु की प्रतीक्षा के एक और स्वार्थी पाप का बोझनहीं उठा सकती मेरी आत्मा।

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