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Diya | Om Prakash Valmiki
Diya | Om Prakash Valmiki

Diya | Om Prakash Valmiki

00:01:55
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दिया । ओमप्रकाश वाल्मीकि कच्चे घर मेंजलते दीए की रोशनी परक़ब्ज़ा करके बैठ गए हो तुम।लौ के ठीक ऊपर काला धुआँ है।जो पर्त दर-पर्तकालिख पोत रहा हैदीवार पर,नीचे गहरा अँधेरा हैजिसमें दीपदान को पकड़े रहा हूँ मैंहज़ार-हज़ार वर्षों से अनवरत।मेरी पिंडलियोंऔर भुजाओं के माँस से बनी हैं बातीहड्डियों को निचोड़करनिकाला गया है तेल।अँधेरे में,कालिख पुता मेरा जिस्मजिसे तुमने अपवित्रघोषित कर दियातिल-तिल जल रहा हैतुम्हें रोशनी देने के लिए।किंतु इतना याद रखोजिस रोज़ इंकार कर दियादीया बनने सेमेरे जिस्म नेअँधेरे में खो जाओगेहमेशा-हमेशा के लिए।

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