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Intezaar | Padma Sachdev
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इंतज़ार ।  पद्मा सचदेवफागुन की डयौढ़ी के आगेलग गया पहाड़ सूखी पत्तियों काकोई पत्ता सीधा कोई गोल-सा हुआ पड़ाकोई धीरे-धीरे ले रहा है साँसकोई लगता है यूँ बिल्कुल मरा-साटहनियों पर नए फूलआने को आतुर बड़ेहरी टहनियों के ऊपर जैसे हों मोती जड़ेखुलेगी जब कली आ ही जाएँगेमुट्ठी बंद, बंद आँख, बंद होंठसब ही तो खुल जाएँगेछोटे-छोटे हाथ पाँव, बाँह और छोटा-सा पेटखिलेगी पूरी बहारफागुन भी करता इसी का इंतज़ार

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