Login to make your Collection, Create Playlists and Favourite Songs

Login / Register
Suraj Doob Raha Hai | Kumar Divyanshu Shekhar
Suraj Doob Raha Hai | Kumar Divyanshu Shekhar

Suraj Doob Raha Hai | Kumar Divyanshu Shekhar

00:02:56
Report
 सूरज डूब रहा है  | कुमार दिव्यांशु शेखरसूरज डूब रहा हैऔर मन भी।गैयों के धूल उड़ाते खुरस्मृतियों के ललाते आकाश परछींटते हैंविस्मृतियों का धुँधलका।कच्ची नींद से उठबैसाख की दोपहरपूस की भोर मेंसानी-पानी देते हाथघूम जाते हैं धुँधलकों के पीछे।ललाती साँझ पर मिट्टी मलते गैयों के झुंड।जी चाहता है दो कदम तेज़ लपकसट लूँ इनसेदुलारूँ, गर्दन सहलाऊँपर मेरी बाहें छाती को चिपकी रहती हैं।फट के बह न जाए ज्वालामुखी इसलिए सीने को दबाकर बाँध दिया है इन्हेंबंधन ऐसा किनन्हें पिल्लों को दे सके बिस्कुट इतना हिलना भी है मुश्किल।सूरज डूब रहा हैडूब रही हैं आँखें-पनियायी आँखेंट्रैक्टर-थ्रेशर के इंतज़ार मेंआए तो फसल तैयार होकर पहुँचे घर को, औरपनियायी डूबी आँखें क्लासरूम में ऊपर बोर्ड के बाईं ओर कोने में पाठदाता बनकर।साँझ की ललाई कोधूमिल करते गैयों के खुरआकाश के कैनवस पर धुआँ उड़ाते हैं।धुएँ के पार छिटकी है चाँदनीवह लड़का दस बरस का अपनी ही तुकबंदियों पर नाचता है कैसेअगली भोर की चिंताओं से बेखबर।जी चाहता है दो कदम तेज़ लपकपार हो जाऊँ धुएँ केपर इतने भारी मन से धड़कता है दिलकभी भी रुक सकता हैसो धीरे चलना है मुनासिब गैयों के पीछे।सूरज डूब रहा हैऔर मन भी।

Suraj Doob Raha Hai | Kumar Divyanshu Shekhar

View more comments
View All Notifications