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Yugm | Vivek Nirala
Yugm | Vivek Nirala

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00:01:34
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युग्म | विवेक निराला   एक समय में रहे होंगे कम-से-कम-दो जितने कि आवश्यक हैं सृष्टि के लिए।दो आवाज़ें भी रही होंगी कम-से-कम एक सन्नाटे की एक अँधेरे की।अँधेरा भी दो तरह का रहा होगा अवश्य एक भीतर का दूसरा बाहर का।जल-थल सर्दी-गर्मी दिन-रात युग्म में ही रहा होगा जीवनसुख-दुख से भरा हुआ।
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